उदयपुर से ज्योति कविश सोनी की कविता – सच कहते हो तुम

** सच कहते हो तुम **
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सच कहते हो ..
तुम ..
मुझे जीना ही..
नहीं आया ..
कितनो से ..
खायी ठोकर ..
फिर भी चलना ..
न आया ..
बस खुद से रोये ..
और ..
खुद को ही .
समझा दिया ..
सच कहते हो ..
तुम ..
मुझे हालातों में..
ढ़लना नहीं आया ||
आत्मसम्मान ..
क्या होता है..
कभी जाना..
ही नही ..
सिर्फ समर्पण..
करना आया ..
लड़ना नहीं आया ..
सच कहते हो ..
तुम ..
मुझे घाव अपने ..
भरना नही आया ||
मेरी मासूमियत ही ..
मेरी कमजोरी..
है शायद ..
चाले चलकर  ..
रिश्ते निभाना ..
नहीं आया ..
सच कहते हो..
तुम ..
मुझे जीना ही..
  नही आया ||

       ** मौलिक **
– ज्योति कविश सोनी , उदयपुर

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